पत्थर
अब तो नंगे पैर चलने की आदत हो गई है!
रास्तो के कंकरो से दोस्ती हो गई है!
ओ भी अब तलवो को हाल पुछ लेते है
मगर जाते जाते चूभके ही जाते है!
हम भी ऊन्हे मजा देते है जखमो को चीपनेका
शायद रास्ता तो सुकून का हो मेरे पिछेआने वाले अपनोका ||२||
-जयंत जगताप
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